ગુરુવાર, 16 એપ્રિલ, 2020

रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य

🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹

1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।
2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।
3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।
4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।
5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।
6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।
7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।

8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।
9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।
10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।
11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।
12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।
13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।
14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।

15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।
16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।

17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।
18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।
19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | 
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यह जानकारी  महीनों के परिश्रम केबाद आपके सम्मुख प्रस्तुत है । 

ગુરુવાર, 9 એપ્રિલ, 2020

मेरी कविताएं : मुस्कुराना सिखाना है।

चलो फिर से हाक़ल पड़ी है, सारे संसार को बचाना है।
आओ साथ मिलके सब को मुस्कुराना सिखाना है।
सांसे रुक गई, जीवन रुक गया। रुक गया सारा संसार ।
अब ना रुकेगा और कुछ, बस यही हौसला जगाना है।
आओ साथ मिलके सब को मुस्कुराना  सिखाना है
समय का तकाजा देखो, यहां मिलने से मौत मिलती है।
दूरियां ही जीवन है प्यारे। बस यही सब को बताना है। 
आओ साथ मिलके सब को मुस्कुराना सिखाना है।
हर जगह है मौत का तांडव, देखकर घबराया है सारा जहां।
कोई अकेला नहीं है जहां मै, बस यही दिलासा जगाना है।
आओ साथ मिलके सब को मुस्कुराना सिखाना है। 
दिन रात गुजारना कठिन हुआ, यहां हर कोई आज परेशान है।
होगी फिर से नई सुबह, यही आश सब में जगाना है।
आओ साथ मिलके सब को मुस्कुराना सिखाना है। 
@धरम खत्री राजपिपला
दिनांक: ०९/०४/२०२०

ગુરુવાર, 12 માર્ચ, 2020

दीपक का महत्व

क्या आप पूजा में दीपक का महत्व जानते हैं ?  मित्रो प्रस्तुति विस्तृत है इसलिए शेयर या कॉपी करके समय मिलने पर शान्ति से पढ़े।

जब हम किसी देवता का पूजन करते हैं तो सामान्यतः दीपक जलाते हैं। दीपक किसी भी पूजा का महत्त्वपूर्ण अंग है । हमारे मस्तिष्क में सामान्यतया घी अथवा तेल का दीपक जलाने की बात आती है और हम जलाते हैं। 

जब हम धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की साधना अथवा सिद्धि के मार्ग पर चलते हैं तो दीपक का महत्व विशिष्ट हो जाता है। दीपक कैसा हो, उसमे कितनी बत्तियां हों , इसका भी एक विशेष महत्त्व है। उसमें जलने वाला तेल व घी किस-किस प्रकार का हो, इसका भी विशेष महत्त्व है। उस देवता की कृपा प्राप्त करने और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन हिन्दू शास्त्रों के अनुसार आज भी पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजा करने को महत्व दिया जाता है। पूजा के लिए सही सामग्री, स्पष्ट रूप से मंत्रों का उच्चारण एवं रीति अनुसार पूजा में सदस्यों का बैठना, हर प्रकार से पूजा को विधिपूर्वक बनाने की कोशिश की जाती है।

पूजा में ध्यान देने योग्य बातों में से ही एक है दीपक जलाते समय नियमों का पालन करना। पूजा में सबसे अहम है दीपक जलाना। इसके बिना पूजा का आगे बढ़ना कठिन है। पूजा के दौरान और उसके बाद भी कई घंटों तक दीपक जलते रहना शुभ माना जाता है।

यह दीपक रोशनी प्रदान करता है। रोशनी से संबंधित शास्त्रों में एक पंक्ति उल्लेखनीय है – असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमया। मृत्योर्मामृतं गमय॥ ॐ शांति शांति शांति (स्रो: बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28)।

उपरोक्त पंक्ति में दिए गए ‘तमसो मा ज्योतिर्गमया’ का अर्थ है अंधकार से उजाले की ओर प्रस्थान करना। आध्यात्मिक पहलू से दीपक ही मनुष्य को अंधकार के जंजाल से उजाले की किरण की ओर ले जाता है। इस दीपक को जलाने के लिए तिल का तेल या फिर घी का इस्तेमाल किया जाता है।

परन्तु शास्त्रों में दीपक जलाने के लिए खासतौर से घी का उपयोग करने को ही तवज्जो दी जाती है। जिसका एक कारण है घी का पवित्रता से संबंध। घी को बनाने के लिए ही गाय के दूध की आवश्यकता होती है। गाय को हिन्दू मान्यताओं के अनुसार उत्तम दर्जा प्राप्त है।

गाय को मां का स्थान दिया गया है और उसे ‘गौ माता’ कहकर बुलाया जाता है। यही कारण है कि उसके द्वारा दिया गया दूध भी अपने आप ही पवित्रता का स्रोत माना गया है। इसीलिए उससे बना हुई घी भी सबसे पवित्र माना गया है। घी के अलावा तिल का तेल से दीपक जलाया जाता है। कुछ लोगों द्वारा अंधकार दूर करने के लिए मोमबत्ती का इस्तेमाल भी किया जाता है।

किन्तु शास्त्रों में मोमबत्ती का इस्तेमाल वर्जित माना गया है। कहते हैं मोमबत्ती एक ऐसी वस्तु है जो केवल आत्माओं को अपने उजाले से निमंत्रण देती है। इसको जलाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। इसीलिए इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए मनुष्य को।

पूजा के समय घी का दीपक उपयोग करने का एक और आध्यात्मिक कारण है। शास्त्रों के अनुसार यह माना गया है कि पूजन में पंचामृत का बहुत महत्व है और घी उन्हीं पंचामृत में से एक माना गया है। इसीलिए घी का दीपक जलाया जाता है।

अग्नि पुराण में भी दीपक को किस पदार्थ से जलाना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है। इस पुराण के अनुसार, दीपक को केवल घी या फिर तिल का तेल से ही जलाना चाहिए। इसके अलावा किसी भी अन्य पदार्थ का इस्तेमाल करना अशुभ एवं वर्जित माना गया है।

शास्त्रों में दीपक जलाने के लिए तेल से ज्यादा घी को सात्विक माना गया है। दोनों ही पदार्थों से दीपक को जलाने के बाद वातावरण में सात्विक तरंगों की उत्पत्ति होती है, लेकिन तेल की तुलना में घी वातावरण को पवित्र रखने में ज्यादा सहायक माना गया है।

इसके अलावा यदि तेल के इस्तेमाल से दीपक जलाया गया है तो वह अपनी पवित्र तरंगों को अपने स्थान से कम से कम एक मीटर तक फैलाने में सफल होता है। किन्तु यदि घी के उपयोग से दीपक जल रहा हो तो उसकी पवित्रता स्वर्ग लोक तक पहुंचने में सक्षम होती है।

कहते हैं कि यदि तिल का तेल के उपयोग से दीपक जलाया जाए तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगे दीपक के बुझने के आधे घंटे बाद तक वातावरण को पवित्र बनाए रखती हैं। लेकिन घी वाला दीपक बुझने के बाद भी करीब चार घंटे से भी ज्यादा समय तक अपनी सात्विक ऊर्जा को बनाए रखता है।

दीपक को घी से ही जलाने के पीछे मानवीय शारीरिक चक्रों का भी महत्व है। ऐसा माना जाता है कि मानव शरीर में सात चक्रों का समावेश होता है। यह सात चक्र शरीर में विभिन्न प्रकार की ऊर्जा को उत्पन्न करने का कार्य करते हैं। यह चक्र मनुष्य के तन, मन एवं मस्तिष्क को नियंत्रित करते हैं।

यदि तिल का तेल से दीपक जलाया जाए तो यह मानव शरीर के मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र को एक सीमा तक पवित्र करने का कार्य करता है। लेकिन यदि दीपक घी के इस्तेमाल से जलाया जाए तो यह पूर्ण रूप से सात चक्रों में से मणिपुर तथा अनाहत चक्र को शुद्ध करता है।

इन सात चक्रों के अलावा मनुष्य के शरीर में कुछ ऊर्जा स्रोत भी होते हैं। इन्हें नाड़ी अथवा चैनेल कहा जाता है। इनमें से तीन प्रमुख नाड़ियां है – चंद्र नाड़ी, सूर्य नाड़ी तथा सुषुम्ना नाड़ी। शरीर में चंद्र नाड़ी से ऊर्जा प्राप्त होने पर मनुष्य तन एवं मन की शांति को महसूस करता है।

सूर्य नाड़ी उसे ऊर्जा देती है तथा सुषुम्ना नाड़ी से मनुष्य अध्यात्म को हासिल करता है। मान्यता के अनुसार यदि तिल के तेल के उपयोग से दीपक को जलाया जाए तो वह केवल सूर्य नाड़ी को जागृत करता है। लेकिन घी से जलाया हुआ दीपक शरीर की तीनों प्रमुख नाड़ियों को जागृत करता है।

दीपक जलाने के लिए घी का उपयोग करने के पीछे केवल शास्त्र ही नहीं विज्ञान भी ज़ोर देता है। शास्त्रीय विज्ञान में अहम माने जाने वाले वास्तु शास्त्र विज्ञान के अनुसार घी से प्रज्जवलित किया हुआ दीपक अनेक फायदों से पूरित होता है। ज्योतिष के अनुसार दीपक को सकारात्मकता का प्रतीक व दरिद्रता को दूर करने वाला माना जाता है।

जन्म-कुंडली के अनुसार दोषों को दूर करने के लिए अनेक उपायों में से एक होता है घी द्वारा जलाया हुआ दीपक। ऐसी भी मान्यता है कि घर में घी का दीपक जलाने से वास्तुदोष भी दूर होते हैं। क्योंकि यह घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को लाने की काम करता है।

कहते हैं कि गाय के घी में रोगाणुओं को भगाने की क्षमता होती है। यह घी जब दीपक की सहायता से अग्नि के संपर्क में आता है तो वातावरण को पवित्र बना देता है। इसके जरिये प्रदूषण दूर होता है। इसी तरह के गुण तिल के तेल में भी पाये जाते हैं.,यह भी आक्सीजन की वृद्धि करता है, माना जाता है कि दीपक जलाने से पूरे घर को फायदा मिलता है। चाहे उस घर का कोई व्यक्ति पूजा में सम्मिलित हो या ना हो, उसे भी इस ऊर्जा का लाभ प्राप्त होता है!

आपको बताते है कि दीपक को जलाने के विभिन्न प्रकार तरीके जिससे आपके इष्टदेव खुश होंगे और घर में सुख-समृद्धि का स्थायी वास भी होगा।

भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए तीन बत्तियों वाला घी का दीपक जलानें से मनोकामनायें पूर्ण होती है।

यदि आप मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं और चाहते हैं कि उनकी कृपा आप पर बरसे तो उसके लिए आपको सातमुखी तिल के तेल का दीपक जलायें।

देवी के हमेशा तिल के तेल ही दिपक जलाना चाहिए, साथ में गाय के घी का भी जलाना चाहिए, दाऐ तरफ घी का और बांऐ तरफ तिल के तेल का दीपक रखना चाहिए!

यदि आपका सूर्य ग्रह कमजोर है तो उसे बलवान करने के लिए, आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करें और साथ में तिल के तेल का दीपक जलायें।

आर्थिक लाभ पाने के लिए आपको नियमित रूप से शुद्ध देशी गाय के घी का दीपक जलाना चाहिए।

शत्रुओं व विरोधियों के दमन हेतु भैरव जी के समक्ष तिल के तेल का दीपक जलाने से लाभ होगा।

शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या से पीड़ित लोग शनि मन्दिर में शनि स्त्रोत का पाठ करें और तिल के तेल का दीपक जलायें।

पति की आयु व अरोग्यता के लिए महुये के तेल का दीपक जलाने से अल्पायु योग भी नष्ट हो जाता है।

शिक्षा में सफलता पाने के लिए सरस्वती जी की आराधना करें और दो मुखी घी वाला दीपक जलाने से अनुकूल परिणाम आते हैं।

मां दुर्गा या काली जी प्रसन्नता के लिए एक मुखी दीपक गाय के घी में और एक मुखी तिल के तेल का जलाना चाहिए।

भोले बाबा की कृपा बरसती रहे इसके लिए आठ या बारह मुखी तिल के तेल वाला दीपक जलाना चाहिए।

भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए सोलह बत्तियों वाला गाय के घी का दीपक जलाना लाभप्रद होता है।

हनुमान जी की प्रसन्नता के लिए तिल के तेल आठ बत्तियों वाला दीपक जलाना अत्यन्त लाभकारी रहता है।

पूजा की थाली या आरती के समय एक साथ कई प्रकार के दीपक जलाये जा सकते हैं।
संकल्प लेकर किया गये अनुष्ठान या साधना में अखण्ड ज्योति जलाने का प्रावधान है।

अग्नि पुराण, ब्रम्हवर्तक पुराण, देवी पुराण, उपनिषदों तथा वेदों में गाय के घी तथा तिल के तेल से ही दीपक जलाने का विधान है, अन्य किसी भी प्रकार के तेल से दिपक जलाना निषेध है!

आज कल सरसों के तेल में दिपक जलाने की प्रथा है, लेकिन सरसों तेल नाम किसी भी पुराण आदि नही है, क्योंकि सरसों बहार से आया हुआ बीज है, यह भारत की संस्कृति से अलग है, इसका प्रारंभ काल, मात्र 85 वर्ष ही है और इस बीज की उत्पत्ति, अग्रेजी शासन काल में ही हुई थी, अतः यह औषधियों एवं धार्मिक कार्यो के लिए उचित नहीं है!!

अतः साधक अपने विवेक तथा साधना सिद्धि के अनुसार उत्तरदायी है!!

        - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

બુધવાર, 30 ઑક્ટોબર, 2019

विभिन्न संस्थाओं के संस्कृत ध्येय वाक्य

*एक एक कर पढें कि संस्कृत किस तरह भारत की नींव है* -
विभिन्न संस्थाओं के संस्कृत ध्येय वाक्य ---

●भारत सरकार👉 सत्यमेव जयते
●लोक सभा👉 धर्मचक्र प्रवर्तनाय
●उच्चतम न्यायालय👉 यतो धर्मस्ततो जयः
●आल इंडिया रेडियो👉 सर्वजन हिताय सर्वजनसुखाय 
●दूरदर्शन👉 सत्यं शिवं सुन्दरम्
●गोवा राज्य👉 सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
●भारतीय जीवन बीमा निगम👉 योगक्षेमं वहाम्यहम्
●डाक तार विभाग👉 अहर्निशं सेवामहे
●श्रम मंत्रालय👉 श्रम एव जयते
●भारतीय सांख्यिकी संस्थान👉 भिन्नेष्वेकस्य दर्शनम्
●थल सेना👉 सेवा अस्माकं धर्मः
●वायु सेना👉 नभःस्पृशं दीप्तम्
●जल सेना👉 शं नो वरुणः
●मुंबई पुलिस👉 सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय
●हिंदी अकादमी👉 अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्
●भारतीय राष्ट्रीय विज्ञानं अकादमी👉 हव्याभिर्भगः सवितुर्वरेण्यम्
●भारतीय प्रशासनिक सेवा अकादमी👉 योगः कर्मसु कौशलम्
●विश्वविद्यालय अनुदान आयोग👉 ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये
●नेशनल कौंसिल फॉर टीचर एजुकेशन👉 गुरुर्गुरुतमो धाम
●गुरुकुल काङ्गडी विश्वविद्यालय👉 ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत
●इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय👉 ज्योतिर्व्रणीत तमसो विज्ञानन
●काशी हिन्दू विश्वविद्यालय:👉 विद्ययाऽमृतमश्नुते
●आन्ध्र विश्वविद्यालय👉 तेजस्विनावधीतमस्तु
●बंगाल अभियांत्रिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय,
शिवपुर👉 उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत
●गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय👉 आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः
●संपूणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय👉 श्रुतं मे गोपाय
●श्री वैंकटेश्वर विश्वविद्यालय👉 ज्ञानं सम्यग् वेक्षणम्
●कालीकट विश्वविद्यालय👉 निर्भय कर्मणा श्री
●दिल्ली विश्वविद्यालय👉 निष्ठा धृति: सत्यम्
●केरल विश्वविद्यालय👉 कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा
●राजस्थान विश्वविद्यालय👉 धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा
●पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय👉
युक्तिहीने विचारे तु धर्महानि: प्रजायते
●वनस्थली विद्यापीठ👉 सा विद्या या विमुक्तये।
●राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्👉
विद्याsमृतमश्नुते।
●केन्द्रीय विद्यालय👉 तत् त्वं पूषन् अपावृणु
●केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड👉 असतो मा सद्गमय
प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम👉 कर्मज्यायो हि अकर्मण:
●देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर👉 धियो यो नः प्रचोदयात्
●गोविंद बल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय
●मदनमोहन मालवीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय गोरखपुर👉 योगः कर्मसु कौशलम्
●भारतीय प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय, हैदराबाद👉 संगच्छध्वं संवदध्वम्
●इंडिया विश्वविद्यालय का राष्ट्रीय विधि विद्यालय👉 धर्मो रक्षति रक्षितः
●संत स्टीफन महाविद्यालय, दिल्ली👉 सत्यमेव विजयते नानृतम्
●अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान👉 शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम्
●विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नागपुर👉 योग: कर्मसु कौशलम्
●मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,इलाहाबाद👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा
●बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी👉 ज्ञानं परमं बलम्
●भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर👉 योगः कर्मसुकौशलम्
●भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई👉 ज्ञानं परमं ध्येयम्
●भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर👉 तमसो मा ज्योतिर्गमय
●भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान चेन्नई👉 सिद्धिर्भवति कर्मजा
●भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की👉 श्रमं विना नकिमपि साध्यम्
●भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद👉 विद्या विनियोगाद्विकास:
●भारतीय प्रबंधन संस्थान बंगलौर👉 तेजस्वि नावधीतमस्तु
●भारतीय प्रबंधन संस्थान कोझीकोड👉 योगः कर्मसु कौशलम्
●सेना ई एम ई कोर👉 कर्मह हि धर्मह
●सेना राजपूताना राजफल👉 वीर भोग्या वसुन्धरा
●सेना मेडिकल कोर👉 सर्वे संतु निरामया ..
●सेना शिक्षा कोर👉 विद्यैव बलम्
●सेना एयर डिफेन्स👉 आकाशेय शत्रुन् जहि
●सेना ग्रेनेडियर रेजिमेन्ट.👉 सर्वदा शक्तिशालिम्
●सेना राजपूत बटालियन👉 सर्वत्र विजये
●सेना डोगरा रेजिमेन्ट👉 कर्तव्यम् अन्वात्मा
●सेना गढवाल रायफल👉 युद्धया कृत निश्चयः
●सेना कुमायू रेजिमेन्ट👉 पराक्रमो विजयते
●सेना महार रेजिमेन्ट👉 यश सिद्धि?
●सेना जम्मू काश्मीर रायफल👉 प्रस्थ रणवीरता?
●सेना कश्मीर लाइट इंफैन्ट्री👉 बलिदानं वीर-लक्ष्यम्?
●सेना इंजीनियर रेजिमेन्ट👉 सर्वत्र
●भारतीय तट रक्षक-वयम् रक्षामः
●सैन्य विद्यालय👉 युद्धं प्रगायय?
●सैन्य अनुसंधान केंद्र👉 बलस्य मूलं विज्ञानम्
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मित्रों!
*सिलसिला यहिं खतम नहीं होता*,
विदेशी भी हमारे कायल हैं देखो जरा...
●नेपाल सरकार👉 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
●इंडोनेशिया-जलसेना 👉 जलेष्वेव जयामहे (इंडोनेशिया) -
पञ्चचित
●कोलंबो विश्वविद्यालय- (श्रीलंका)👉 बुद्धि: सर्वत्र भ्राजते
●मोराटुवा विश्वविद्यालय (श्रीलंका)👉 विद्यैव सर्वधनम्
पेरादे
 पञ्चचित
●पेरादेनिया विश्वविद्यालय👉 सर्वस्य लोचनशास्त्रम्
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*जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्*
भारत माता की जय⛳🚩🚩🙏

રવિવાર, 11 ઑગસ્ટ, 2019

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या है अंतर ?

!!!एक रोचक तथ्य!!!

जानिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या है अंतर ?

पहला अंतर

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है, जिसे ध्वजारोहण कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना  को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में Flag Hoisting (ध्वजारोहण) कहा जाता है।

जबकि

26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है, संविधान में इसे Flag Unfurling (झंडा फहराना) कहा जाता है।
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दूसरा अंतर

15 अगस्त के दिन प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।

जबकि

26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं
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तीसरा अंतर

स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से ध्वजारोहण किया जाता है।

जबकि

गणतंत्र दिवस के दिन  राजपथ  पर झंडा फहराया जाता है।

શનિવાર, 25 મે, 2019

Do we know actual full form of some words???

Do we know actual full form of some words??? 

News paper = North East West South past and present events report.

Chess = Chariot, Horse, Elephant, Soldiers.

Cold =Chronic Obstructive Lung Disease.

Joke =Joy of Kids Entertainment.

Aim =Ambition in Mind.

Date =Day and Time Evolution.

Eat =Energy and Taste.

Tea =Taste and Energy Admitted.

Pen =Power Enriched in Nib.

Smile =Sweet Memories in Lips Expression.

Bye =Be with you Everytime.

રવિવાર, 10 માર્ચ, 2019

ब्राह्मण समाज

ब्राह्मण निर्धन होगा तो बनेगा सुदामा फिर एकदिन कृष्ण उसकी सेवा करेँगे..

ब्राह्मण अपमानित होगा तो बनेगा चाणक्य,फिर एक दिन नये राज्य कि स्थापना कर देगा,,,
ब्राह्मण सटया जायेगा तो बनेगा परशुराम, फिर एक दिन पापीयो का विनाश कर देगा,

ब्राह्मण पढेगा तो आर्यभट्ट बन जायेगा,
फिर एक दिन पुरे विश्व को 0 (ZERO)दे जायेगा,
ब्राह्मण जब वेद धर्म का विनाश देखेगा,
तो आदि शँकराचार्य बन जायेगा फिर एक दिन वैदिक धर्म कि स्थापना कर देगा,

ब्राह्मण जब लोगो को बीमार देखेगा तो
चरक बन जायेगा, फिर एक दिन पुरे विश्व को आर्युवेद दे जायेगा,

ब्राह्मण ने हमेशा अपने ज्ञान के प्रकाश से विश्व को प्रकाशित किया है,
प्रणाम है ब्राह्मण समाज को. .
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी.

ब्राह्मण धर्म - वेद
ब्राह्मण कर्म - गायत्री
ब्राह्मण जीवन - त्याग
ब्राह्मण मित्र - सुदामा
ब्राह्मण क्रोध - परशुराम
ब्राह्मण त्याग - ऋषि दधिची
ब्राह्मण राज - बाजीराव पेशवा
ब्राह्मण प्रतिज्ञा - चाणक्य
ब्राह्मण बलिदान - मंगल आजाद
ब्राह्मण भक्ति - रावण
ब्राह्मण ज्ञान - आदि गुरु शंकराचार्य
ब्राह्मण सुधारक - महर्षि दयानंद
ब्राह्मण राजनीतिज्ञ - कोटिल्य
ब्राह्मण विज्ञान - आर्यभट
ब्राह्मण गणितज्ञ - रामानुजम
ब्राह्मण खिलाड़ी - सचिन तेंदुलकर

कर्म से, धर्म से, दान से, ज्ञान से, विज्ञान से,
नाम से, जीवन से, मृत्यु से, भक्ति से, शक्ति से,
मुक्ति से, आत्मा से, परमात्मा से, मूल्यों से,
संस्कारो से, बल से, बुद्धि से, कौशल से, सम्मान से, विश्वास से ब्राह्मण बनना शुरू करिए तभी अपने पूर्वजो के किये गौरवशाली कार्यो पर आप गर्व कर पायगे...
"ब्राह्मण महिमा"
ब्राह्मण:- ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न सर्वोच्च वर्ण ।
१ ब्राह्मण का जन्म: भगवान् विष्णु का अंश अवतार।
२ ब्राह्मण की विद्या: ज्ञान का अथाह सागर ।
३ ब्राह्मण की बुद्धि : समस्त समस्याओं का समाधान।
४ ब्राह्मण की वाणी : वेद का ज्ञान ।
५ ब्राह्मण की शिक्षा : जीवन जीने की कला ।
६ ब्राह्मण की दृष्टी ; सम्भाव।
७ ब्राह्मण की शिखा: संकल्पों का समूह ।
८ ब्राह्मण की दया : संकटों का हरण ।
९ ब्राह्मण की कृपा : भवसागर तरने का साधन ।
१० ब्राह्मण का कर्म : सर्व जन हिताय ।
११ ब्राह्मण का निवास : देवालय ।
१२ ब्राह्मण के दर्शन : सर्वमंगल ।
१३ ब्राह्मण का आशीर्वाद : समस्त सुखो की प्राप्ति ।
१४ ब्राह्मण की सेवा : परलोक सुधारना ।
१५ ब्राह्मण का वरदान: मोक्ष की प्राप्ति ।
१६ ब्राह्मण का अस्त्र : श्राप ।
१७ ब्राह्मण का शस्त्र : कलम ।
१८ ब्राह्मण को दान : सहस्त्रो पापो से मुक्ति ।
१९ ब्राह्मण को दक्षिणा : सात पीढ़ी का उद्धार
२० ब्राह्मण की संतुष्ठी: सभी भयो से मुक्ति ।
२१ ब्राह्मण की हुँकार: राजा महाराजयों का चरणागत होना ।
२२ ब्राह्मण की गर्जना : सर्वभूतों का संहार ।
२३ ब्राह्मण का कोप : सर्वनाश ।
२४ सर्व ब्राह्मण की एकता : सर्व शक्तिमान।
जय महाकाल .....जय परशुराम ...